जलवायु परिवर्तन क्या है? मौसम का परंपरागत हिसाब-किताब इधर से उधर हो जाए तो उसे जलवायु परिवर्तन कहते हैं. उदाहरण के लिए पहाड़ों में बुरांस के फूल पहले जिस माह में खिलते थे, अब उससे दो-तीन माह पहले ही खिलने लगे हैं. यह मौसम में बदलाव के कारण हुआ है और ऐसा धरती का तापमान बढ़ने के कारण होता है.
जलवायु परिवर्तन मात्र कुछ दशकों में भी हो सकता है तो इसमें लाखों वर्ष भी लग सकते हैं. जलवायु परिवर्तन के कारण भी अनेक हैं — बायोटिक प्रक्रिया, पृथ्वी को प्राप्त होने वाले सौर विकिरण में उतार-चढाव, प्लेट टेक्टोनिक्स, पृथ्वी की धुरी में परिवर्तन, पर्वतशृंखलाओं-समुद्रों और महाद्वीपों के स्थान में परिवर्तन की प्रक्रिया, ज्वालामुखी फटना और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन. जलवायु परिवर्तन के लिए मानवीय कारण भी जिम्मेदार हैं और आज वैश्विक तापमान में वृद्धि मानवीय कारणों से ही मानी जा रही है.
विश्व मौसम संगठन (डब्ल्यूएमओ) के अनुसार 2013 में ही वातावरण में ग्रीनहाउस गैस प्रदूषण रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका था. हिमालय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का असर ज्यादा इसलिए दिखाई दे रहा है क्योंकि ये क्षेत्र पारिस्थितिक रूप से ज्यादा संवेदनशील हैं. आज जलवायु परिवर्तन का संकट विकराल रूप धारण कर रहा है. लम्बे समय तक पश्चिमी और औद्योगिक देशों ने प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग अपने लालच के लिए खूब किया और अब यही देश चाहते हैं कि चीन, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसी महत्वपूर्ण विकासशील अर्थव्यवस्थाएं अपने यहां उत्पादन करने में संयम बरतें.
अर्थव्यवस्थाओं का उदारीकरण और बाजारीकरण करने वाले और उपभोक्तावाद को प्रश्रय देने वाले देश आज चाहते हैं कि विकासशील देश ठोस कदम उठाएं; जबकि क्योतो प्रोतोकॉल को निष्प्रभावी बनाने वाले तो पश्चिमी देश ही थे. क्या यह अच्छा न होता कि विकसित और पश्चिमी देश पहले अपने यहां खपत में कटौती करते और तब अन्य देशों से उत्पादन में कमी की अपेक्षा करते?
कुल मिलाकर, इस बहस से बाहर निकलकर जलवायु परिवर्तन संकट का स्थायी समाधान खोजना होगा. यह स्पष्ट है कि साम्राज्यवादी विकसित देशों द्वारा बड़ी मात्रा में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन के कारण विश्व पारिस्थितिकी में गंभीर परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं और उनकी इस करतूत का खामियाजा आज पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है. यह बात भी उल्लेखनीय है कि सरकारें एक ओर इकोसेंसिटिव जोन, नैशनल पार्क और सैंक्चुअरी बनाकर लोगों को उनके पारंपरिक अधिकारों से वंचित कर रही हैं तो दूसरी ओर कंपनियों को जलविद्युत परियोजनाएं लगाकर पर्यावरण के साथ मनमानी करने की छूट दे रही हैं.
यह बात भी मुखरता से चर्चा में है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने में यदि हिमालय क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान सुनिश्चित करना है तो हिमालय संरक्षण मंत्रालय का गठन केंद्रीय स्तर किया जाना अनिवार्य है जो पर्वतों, ग्लेशियरों, नदियों और वनों के नैसर्गिक अधिकारों की सुरक्षा करे. आज जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटना हमारी पीढ़ी का सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है. इसी भावना के साथ 21 सितंबर 2014 को दुनिया के अग्रणी ग्रीन राजनीतिक दलों के अंतर्राष्ट्रीय संगठन ग्लोबल ग्रीन्स ने “ग्लोबल डे ऑव एक्शन के तहत दुनियाभर में कार्यक्रम आयोजित किये थे. इसी दिन न्यूयॉर्क में “जलवायु जनमार्च” भी आयोजित किया गया था. इसके बाद न जाने कहां-कहां और कितने प्रयास किये गए, कहना कठिन है. जलवायु परिवर्तन से जुड़े विषयों पर अनेक कॉप वार्ताएं हो चुकी हैं और हम किसी निर्णायक स्थिति में अब तक नहीं पहुँच पाए हैं.
हमारा मानना है कि जलवायु परिवर्तन के संकट का समाधान स्थानीय से लेकर अंतर्रष्ट्रीय स्तर पर केवल राजनीतिक तरीके से निकाला जा सकता है. इसलिए, हर राजनीतिक पार्टी का दायित्व है कि वह जलवायु परिवर्तन के संकट को लेकर अपनी-अपनी स्पष्ट राय बनाए और साथ ही सरकारों पर दबाव बनाए. जलवायु परिवर्तन का संकट बिल्कुल असली है और इसके समाधान के लिए वैश्विक स्तर पर सर्वमान्य साझे उपाय भी किये जाने चाहिए. उदाहरण के लिए यहां बताना आवश्यक है कि जून 2013 में उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में आयी आपदा और 2014 में जम्मू-कश्मीर में आयी आपदा पारिस्थितिकी में बदलाव अर्थात जलवायु परिवर्तन के कारण हुईं और इसके लिए सरकार की अवांछित गतिविधियां जिम्मेदार रही हैं.
राजनीतिक नेतृत्व को चाहे कि वह जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से तत्परता और साहसपूर्ण ढंग से निपटने के उपायों को लेकर अपनी वचनबद्धता और संकल्प को प्रकट करे, ताकि आने वाले समय में विश्व को भीषण तापमान की त्रासदी से बचाया जा सके. आजकल ग्रीन बोनस की बात भी चल रही है. ग्रीन बोनस के लालच में न पड़कर सरकारों को ऐसे उपाय खोजने चाहिए जिनसे उन समाजों की कठिनाइयां और न बढें जो विभिन्न कानूनों के कारण पहले से ही प्रभावित हैं.
दिसंबर 2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में यूएनएफसीसीसी (युनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज) शिखर सम्मेलन से पहले 23 सितंबर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में शिखर बैठक हुयी थी और पेरिस में 2015 में जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को लेकर सम्मेलन से पहले यह बैठक महत्वपूर्ण थी क्योंकि पेरिस शिखर सम्मेलन में ऐसे समझौते को अंतिम रूप दिये जाने की आशा थी जिसका पालन करना सबके लिए बाध्यकारी होगा. हुआ क्या, सब जानते हैं.
भारत दुनिया के सबसे बड़े कृषि प्रधान देशों में से है, इसलिए जलवायु परिवर्तन का असर इस पर खास होगा. समुद्र के जलस्तर में वृद्धि से भारत में 8-हजार किमी का तटीय क्षेत्र और देश के आधे राज्य प्रभावित होंगे. इसी प्रकार, हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से नदी-नालों पर भीषण प्रभाव पडेगा. घास, वनस्पतियां, जंगल, कृषि सब प्रभावित होंगे. यह देखते हुये समय रहते ठोस उपाय आवश्यक हैं. एडीबी की एक रिपोर्ट “असेसिंग द कॉस्ट्स ऑव क्लाइमेट चेंज एंड एडैप्टेशन इन साउथ एशिया” में कहा गया है कि भारत सहित दक्षिण एशिया के छह देशों के सामूहिक जीडीपी में 2050 तक आर्थिक तौर पर औसतन 1.8 प्रतिशत का वार्षिक घाटा होगा, जो 2100 तक बढकर 8.8 प्रतिशत हो जायेगा. लेकिन यदि जलवायु परिवर्तन के लिए ठोस उपाय किये जाते हैं और तापमान में वृद्धि को दो डिग्री सेंटीग्रेड से नीचे बांधकर रखा जाता है तो वर्ष 2100 तक इस घाटे को दो प्रतिशत से कम रखा जा सकता है.
एक अनुमान के अनुसार यदि धरती के वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों का जमाव 450 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) को पार कर जाता है तो जलवायु परिवर्तन के चक्र को थामना मुश्किल हो जाएगा. इसलिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है कि खपत को कम किया जाए ताकि प्राकृतिक संसाधन लम्बे समय तक चल सकें और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन भी कम हो. अमेरिकी और पश्चिमी समाज को अपनी आवश्यकताओं में कटौती करनी ही होगी. अमेरिका और चीन जैसे शक्तिशाली देश भी जलवायु परिवर्तन की मार से बच नहीं पाएंगे.
पारिस्थितिक नीतियां मनुष्य को केंद्र में रखकर बनाई जानी चाहिए. लेकिन यह भी स्पष्ट है जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से बचने के लिए ठोस उपाय होने चाहिए. उत्पादन और खपत में संतुलन आवश्यक हो और जो देश-समाज विलासी प्रवृत्ति के हैं वे अपने यहां खपत में महत्वपूर्ण कमी लाएं. हिमालय क्षेत्र की पारिस्थितिकी और पर्यावरण के संरक्षण के लिए केंद्रीय स्तर पर हिमालय संरक्षण मंत्रालय की स्थापना की जाए. हिमालय क्षेत्र के लिए केवल विज्ञान और प्रौद्योगिकी की कसौटी पर खरे विकास लक्ष्य निर्धारित हों. ये लक्ष्य इस प्रकार निर्धारित किये जाएं ताकि वैश्विक तापमान वृद्धि 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रहे. हिमालय क्षेत्र में ऐसी हर परियोजना को रोकने के लिए कानून बने जिसके कारण पारिस्थितिक या पर्यावरण संकट की स्थिति पैदा होने का खतरा हो.
जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए आवश्यक है कि धरती पर बच रहे प्राकृतिक और अन्य संसाधनों का उपयोग समझदारी और बराबरी के सिद्धांत से हो. सरकारें कार्बन सिंक और ग्रीन बोनस के दुष्चक्र में न फंसें. ग्रीन बोनस के पचड़े में पड़ने के बजाय सरकारें ऐसे ठोस उपाय करें जिनसे पारिस्थितिक संरक्षण के साथ-साथ उन समाजों की कठिनाइयां कम हों जो विभिन्न जनविरोधी व्यवस्थाओं के कारण प्रभावित हैं. पारिस्थितिक संरक्षण और लोगों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में सामंजस्य स्थापित हो और मनुष्य के कल्याण को समग्र पारिस्थितिक संरक्षण का अंग माना जाए.
देश में लागू तमाम पारिस्थितिक और पर्यावरण कानूनों की समीक्षा हो, अनावश्यक पर्यावरण कानूनों को खत्म किया जाए और ऐसा समग्र पारिस्थितिक संरक्षण कानून बनाया जाए जिसमें मनुष्य को समग्र पारिस्थितिकतंत्र के महत्वपूर्ण अंग के रूप में स्थान हासिल हो. चरणबद्ध तरीके से प्राकृतिक संसाधनों की खपत में कमी लायी जाए ताकि उत्पादन कम हो और ऐसी गैसों का उत्सर्जन भी कम हो जिनके कारण ग्लोबल वार्मिंग होती है और दुष्परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियां बनती हैं.
जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए कार्यक्रम सरकार स्थानीय स्तर पर बनाए और उनमें जनभागीदारी सुनिश्चित करे. साथ ही, ऐसे कार्यक्रमों को जनता के लिए आर्थिक लाभ का माध्यम भी बनाए. पूरे हिमालय क्षेत्र में वनों का कटान संतुलित और वैज्ञानिक ढंग से हो. जितने वृक्ष काटने के लिए चिन्हित हों, उनके बदले नये वृक्षों का रोपण और उनके संरक्षण की योजना पहले सुनिश्चित की जाए. प्राकृतिक वनों और पारिस्थितिक प्रणालियों के संरक्षण के ठोस उपाय हों. चीड़ के वृक्षों का कटान चरणबद्ध तरीके से सुनिश्चित हो और उनके स्थान पर चौड़ी पत्ती वाले वृक्षों के रोपण का सघन कार्यक्रम बनाया जाए.
पनबिजली की केवल ऐसी छोटी परियोजनाओं को अनुमति हो जो विश्व बांध आयोग के मानकों के अनुसार छोटे बांधों की परिभाषा में आती हों. जीवाश्म ईंधन पर सब्सिडी केवल सार्वजनिक हितों के अलावा निर्धन और वंचित वर्गों के लिए हो. साथ ही, जीवाश्म ईंधन पर चरणबद्ध ढंग से निर्भरता कम करने के उपाय किये जाएं. ऊर्जा की उपलब्धता का अधिकार सब वर्गों को समानरूप से हासिल हो. ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का चरणबद्ध ढंग से उपयोग बढे और धीरे-धीरे शत-प्रतिशत वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का लक्ष्य हासिल हो. और सबसे महत्वपूर्ण यह कि देश में परमाणु (नाभिकीय) ऊर्जा उत्पादन पर शीघ्र प्रतिबंध लगे.
कुलमिलाकर, दुनियाभर की सरकारों को यह बताने में देर नहीं करनी चाहिए कि वे अपने यहां क्या कदम उठाने जा रही हैं. और सरकारों द्वारा व्यक्त की जाने वाली प्रतिबद्धताएं और संकल्प क्या इतने ठोस होंगे कि भीषण जलवायु परिवर्तन की त्रासदी से बचा जा सके? फिलहाल तो कथनी और करनी में भारी अंतर है. इसलिए यह जरूरी हो गया है कि इससे बचने के त्वरित और गंभीर उपाय हों.